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भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें

रायपुर। दो घटनाओं ने प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ों के विस्तार की समीक्षा करने की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी है। भ्रष्टाचार का फैलाव गांव से लेकर राजधानी तक प्रदर्शित हो रहा है। पहले मामले में शुक्रवार की सुबह बिलासपुर के किसान छोटूराम केंवट ऋण पुस्तिका के लिए रिश्वत देने के बाद भी पटवारी द्वारा काम नहीं किए जाने पर आत्महत्या कर लेते हैं।

दूसरे मामले में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के ही सात विधायक राष्ट्रीय आजीविका मिशन के संचालक के रूप में दागी बताए जा रहे अधिकारी डॉ. अशोक चतुर्वेदी की नियुक्ति के खिलाफ केंद्रीय नेतृत्व की शरण में पहुंचते हैं। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर बताने को मजबूर हो जाते हैं कि कई मामलों में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच के दायरे में आ चुके अधिकारी को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का संचालक बनाया जाना गलत है।

इससे सरकार की छवि धूमिल होगी। यह जांच का विषय हो सकता है कि डॉ. चतुर्वेदी ने मिशन संचालक का अस्थायी प्रभार लेने के बाद पहले ही दिन सौ करोड़ रुपये के चेक जारी कर कार्य व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया या कुमार लाल चौहान को निर्वाचन कार्य में भेजे जाने के बाद मिले अवसर का गलत तरीके से फायदा उठाने की कोशिश की।

उम्मीद की जानी चाहिए कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मामले की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक निर्णय लेंगे और वास्तविकता सामने आएगी। विभागीय मंत्री टीएस सिंहदेव ने आरोप साबित नहीं होने और नियुक्ति अस्थायी होने का हवाला देते हुए भ्रष्टाचार के आरोपित अधिकारी के बचाव की ही कोशिश की है। इस दृष्टिकोण पर भी मंथन किया जाना चाहिए।

दुखद रूप से बार-बार ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं कि सत्ता में बैठे लोग अपने चहेतों को उपकृत करने की कोशिश करते हैं। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से ईमानदार आचरण की उम्मीद की जाती है, क्योंकि चुनाव के जरिए उन्हें जनता के लिए शासन व्यवस्था को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी दी जाती है।

वादों के जाल में फंसी जनता जब सरकारी खजाने के दुरुपयोग और रिश्वतखोरी का शिकार होने लगती है तो नेतृत्व ही सवालों के घेरे में होता है। ईमानदारी की बात की जाए तो यह नैतिक चरित्र का ही एक पहलू है। काम के प्रति निष्ठा और लगन से व्यक्ति के गुणों का बोध होता है। ईमानदारी में भरोसा, वफादारी और निष्पक्षता भी शामिल है।

भ्रष्ट आचरण में लिप्त अफसरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। यह बार-बार बताने की जरूरत नहीं कि भ्रष्टाचार प्रदेश की प्रगति के मार्ग में मुख्य बाधक है। समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार ही मुख्य कारक है। नेतृत्व के लिए जरूरी होगा कि समय से हस्तक्षेप करें, ताकि स्थितियां बेकाबू न हों।