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जंगल में पानी की कमी, भटककर पहुंची चीतल को कुत्तों ने बनाया शिकार

कोरबा। गर्मी में प्यास से बेहाल वन्य जीव पानी की तलाश में बार-बार आबादी से लगे तालाब व अन्य स्त्रोतों के पास खींचे चले आते हैं। सोमवार की सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक चीतल गांव के नजदीक आ गई। उस पर आवारा कुत्तों की नजर पड़ गई और उन्होंने हमला कर दिया। आफत में फंसी चीतल को कुछ ग्रामीणों ने बचाने का प्रयास भी किया पर बुरी तरह से घायल हो जाने से उसकी मौत हो गई।

गर्मी बढ़ने के साथ ही साथ नदी-नाले सूख रहे हैं। इससे जंगली जानवर पानी की तलाश में गांव की ओर रुख कर रहे हैं। इन दिनों भटककर आबादी के करीब आ रहे वनमंडल कटघोरा में लगातार चीतलों की मौत हो रही है। दस दिन के भीतर यह चीतलों की तीसरी मौत है।

बावजूद वन विभाग की ओर से जंगलों में जंगली जानवरों के लिए पेयजल की व्यवस्था नहीं की जा रही और न ही इनकी सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम किए जा रहे हैं। गांव के करीब आने पर आवारा कुत्ते इन पर हमला कर शिकार बना रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकतर जंगली जानवर पानी प्यास के कारण गांव की ओर भटक कर आ रहे हैं जिसके कारण ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं और इससे उसकी मौत हो रही है।

सोमवार सुबह सात बजे बांगो थाना अंतर्गत ग्राम गुरसिया में जंगल से भटकी चीतल को गांव के कुछ कुत्तों ने मिलकर हमला कर दिया। जब तक ग्रामीण कुछ कर पाटाए, बुरी तरह घायल हो चुकी चीतल की मौत हो चुकी थी। इसकी सूचना वन विभाग को दे दी गई है।

बीते दस दिन में क्षेत्र की तीसरी घटना

इस तरह दस दिन के भीतर तीन चीतल की मौत होना वन विभाग के लिए अच्छी खबर नहीं है। विभाग के अधिकारियों को वन्यजीवों के लिए गर्मी से पूर्व जंगलों में पेयजल की समुचित व्यवस्था करानी चाहिए। इसकी सूचना वन विभाग को सूचना दी गई। वन विभाग के अधिकारी मौका स्थल पर पहुंच कर जानकारी ली और पंचनामा बनाकर पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया।

जंगल से भागने विवश कर रहा दावानल

वर्तमान में जंगलों में आग लगने की बढ़ती घटनाओं के कारण भी जंगली जानवर विचलित होकर ग्रामों की ओर पलायन करते हैं और कुत्तों के शिकार हो जाते हैं। इस नर चीतल की उम्र लगभग ढाई से तीन साल बताई जा रही है, जिसके एक-एक फीट के सिंग निकल आए थे। बढ़ती गर्मी का प्रकोप, जंगल में पानी की कमी की कठिनाई तो फिर भी बर्दाश्त हो जाए पर दावानल से जंगली जानवरों की जान पर मुसीबत से बाहर निकलने के आलवा कोई उपाय नहीं रह जाता। इससे बचने जंगलों से निकलकर वे बस्ती के आसपास तालाब, नाला, नहर पहुंचते हैं, जहां कुत्तों के चंगुल में फंस जाते हैं।