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बेमिसाल था मां का अनुशासन-सेवाभाव, जूनियर्स काे प्यार से देती थीं समझाइश

ग्वालियर। कोरोना की पहली लहर के आखिरी दौर में मैंने अपनी मां लिसी पीटर को खो दिया। वे जेएएच की सीनियर नर्स और ऑपरेशन थिएटर की इंचार्ज थीं। पिछले साल सितंबर में जब देश में कोरोना का सबसे कठिन दौर था, उसी दौरान वे ड्यूटी के दौरान संक्रमित हुईं। पहले यहां फिर दिल्ली में इलाज कराया, लेकिन 11 अक्टूबर को वे कोरोना से हार गईं। कोरोना काल में उन्होंने एक भी छुट्टी नहीं ली। हर दिन 12 से 14 घंटे कोविड वार्ड में ड्यूटी करतीं। कई बार तो वे घर भी नहीं आतीं। पिताजी नाराज होते और मां से कहते अब रिटायरमेंट का वक्त है। संक्रमण का भयावह दौर चल रहा है। घर में रहा करो। वे प्रत्युत्तर में कहतीं-स्टाफ पहले से ही कम है, अगर मैं भी घर बैठ गई तो मरीजों की देखभाल और कठिन हो जाएगी। उनका अनुशासन बेमिसाल था। सेवाभाव उनमें कूट-कूटकर भरा था। अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस की पूर्व संध्या पर लिसी पीटर के जीवन से जुड़े यह संस्करण नईदुनिया से साझा किए उनके बेटे एनिथ पीटर ने। लिसी के परिवार में एक बेटी है, जिसकी शादी हो गई। पति आर्मी से रिटायर है और बेटा एनिथ है।

62 वर्षीय लिसी पीटर मूलत: केरल की रहने वाली थीं। वे न्यूरोलॉजी, मेडिसिन विभाग में रहीं, लेकिन उनका सबसे अधिक समय जेएएच के नेत्र विभाग में बीता। वे इस विभाग के ओटी की इंचार्ज थी। उनके छात्र रहे और वर्तमान में शिवपुरी जिला अस्पताल के कोविड प्रभारी आफ्थेल्मोलॉजिस्ट डॉ गिरीश चतुर्वेदी बताते हैं कि सिस्टर लिसी को हम कभी नहीं भूल सकते। उनका अनुशासन और कार्यशैली हमारे जीवन की अमूल्य पूंजी है। वे गलत बात के लिए अपने वरिष्ठ डाक्टरों को भी टोक देती थीं। उनके लिए नियम अहम थे। चिकित्सकीय शिष्टाचार क्या होते हैं, यह नए डॉक्टर्स उनसे सीखते थे। वे बच्चों जैसा प्यार देकर सिखाती थीं।

सिस्टम की बेरुखी से परिवार हताशः अंचल के सबसे बड़े अस्पताल जयारोग्य में अपना पूरा सेवाकाल देने वालीं सीनियर नर्स लिसी पीटर ने कोरोना ड्यूटी में अपनी जान गंवाई। ड्यूटी करने के दौरान ही वे छह माह पहले कोरोना की चपेट में आ गई थीं और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। कोरोना में फ्रंट लाइन वारियर की चिंता और स्वजनों के लिए राशि देने का दावा करने वाली सरकार के प्रति पति-बेटे में आक्रोश है। सरकारी घोषणा के अनुसार 50 लाख रुपये राशि और अनुकंपा नियुक्ति तो दूर की बात है, सरकार छह माह में भी उनकी पेंशन शुरू नहीं करा सकी है। हर चीज फाइलों में ही अटकी पड़ी है। बेटे की पीड़ा है कि अपना पूरा जीवन जिस संस्थान को मां ने दिया, अब उनके जाने के बाद भी अधिकार के लिए भटकना पड़ रहा है, क्या यही हमारा सिस्टम है।

पूर्व मंत्री, डीन, संभागायुक्त सब जगह लगाई गुहार, सुनवाई नहींः सिस्टर लिसी के पति एस एंटनी ने बताया कि बेटी की शादी हो चुकी है और अब घर में बेटा और वे ही हैं। पत्नी के जाने के बाद बेटे को अनुकंपा नियुक्ति, पेंशन के लिए कोई सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने पूर्व मंत्री माया सिंह, डीन डा.एसएन अयंगर, संभागायुक्त आशीष सक्सेना से लेकर कई जगह आवेदन दिए और गुहार लगाई, लेकिन मदद नहीं हो सकी।