भारतीय नौसेना की बढ़ेगी सामरिक ताकत, अब छठी स्कोर्पिन बागशीर पनडुब्बी का है इंतजार

नई दिल्‍ली। भारतीय नौसेना के बेड़े में स्कोर्पिन क्लास सबमरीन, आईएनएस करंज शामिल हो गया है। यह स्कोर्पिन श्रेणी की तीसरी पनडुब्बी है। फ्रांस की मदद से मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड यानी एमडीएल ने स्कोर्पिन क्लास की इस तीसरी पनडुब्बी का निर्माण किया है। इसका नाम अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार करंज है। के से किलर इन्सटिंक्ट, ए से आत्मनिर्भर-भारत, आर से रेडी, ए से एग्रेसिव, एन से निम्बल और जे से जोश हैं। अलग-अलग रिपोर्ट में यह बात सामने आ रही थी कि भारत की अधिकांश पनडुब्बियां अपनी उम्र पूरी करने वाली है। इस फ्रंट पर हम कमजोर पड़ सकते हैं।

स्कोर्पिन क्लास सबमरीन क्या है?: पनडुब्बी को फ्रांसीसी नौसेना निर्माण दिशा और स्पेनिश नर्वांटया के सहयोग से विकसित किया गया था। यह एक डीजल इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बी है।

2005 में फ्रांस में हुआ था अनुबंध: भारतीय नौसेना ने वर्ष 2005 में प्रोजेक्ट-75 के तहत फ्रांस के साथ छह स्कोर्पिन पनडुब्बियां बनाने का करार हुआ था। हालांकि वर्ष 2012 तक नौसेना को पहली सबमरीन मिल जानी चाहिए थी, लेकिन पहली स्कोर्पिन क्लास पनडुब्बी, कलवरी वर्ष 2017 में ही भारतीय नौसेना को मिल पाई थी। खंडेरी वर्ष 2019 में नौसेना की जंगी बेड़े में शामिल हुई थी। 10 मार्च यानी बुधवार को करज के शामिल होने के बाद माना जा रहा है कि वेला भी इस साल के अंत तक नौसेना को मिल सकती है।

छठी पनडुब्बी बनना शुरू: स्कोर्पिन क्लास की पहली दो पनडुब्बी, आईएनएस कलवरी और आईएनएस खंडेरी पहले ही भारतीय नौसेना के जंगी बेड़े में शामिल हो चुकी हैं और समंदर में ऑपरेशनली तैनात हैं। चौथी पनडुब्बी वेला का समुद्री ट्रायल चल रहा है। पांचवी पनडुब्बी वागिर को भी समंदर में लॉन्च कर दिया गया है। स्र्कोिपन क्लास की छठी सबमरीन वगशीर मझगांव डॉकयार्ड में बननी शुरू हो गई है।

रुस, जर्मनी के साथ मिलकर बनाई पनडुब्बी: वर्तमान समय में भारत के पास 9 सिंधुघोष क्लास या किलो क्लास डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं। इन पनडुब्बियों का निर्माण रूस के रोसवुरुसहेनी एवं भारतीय रक्षा मंत्रालय के बीच हुए समझौते के अंतर्गत किया गया है। इसके अतिरिक्त चार अन्य पनडुब्बियां जर्मनी द्वारा  निर्मित शिशुमार क्लास डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां है। वर्तमान समय में परमाणु पनडुब्बी आईएनएस चक्र को दुनिया की सबसे शक्तिशाली पनडुब्बियों में से एक है।

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन क्या है?: यह एक समुद्री प्रणोदन तकनीक है जो ऑक्सीजन (या वायुजनित ऑक्सीजन) तक पहुंचे बिना गैर-परमाणु पनडुब्बियों के संचालन की अनुमति देती है।

पहली पनडुब्बी हमने रूस ली गई थी किराये पर: आज हम स्वदेशी तरीके से पनडुब्बी बनाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने में 33 साल लगे। भारत ने पहली बार वर्ष 1988 में रूस से किराये पर ली थी। इस पनडुब्बी को वर्ष 1991 में वापस कर दिया गया।

ऋग्वेद में मिलता है प्रमाण भारत के समुद्री इतिहास का: भारत का अपना समुद्री इतिहास रहा है। इसका उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। इसके अनुसार वरुण समुद्र के देवता हैं और उन्हें महासागरीय मार्गों का उन्हें ज्ञान था। भारतीय पुराणों में महासागर, समुद्र और नदियों से जुड़ी हुई कई घटनाएं मिलती हैं जिससे पता चलता है कि मानव को समुद्र संपदा से फायदा हुआ है।

प्राचीन काल में 3000-2000 ई. पू.: भारत के समुद्री इतिहास का आरंभ 3000 ई. पू. से होता है। इस दौरान, सिंधु घाटी सभ्यता के निवासियों का समुद्री व्यापार मेसोपोटामिया के साथ होता था। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों से यह बात सामने आई है कि इस काल में समुद्री गतिविधियों में अच्छी प्रगति हुई

लोथल में ड्राई डॉक की खोज: लोथल (अहमदाबाद से लगभग 400 किमी दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित) में शुष्क गोदी (ड्राई-डॉक) की खोज से यह पता चला है कि यहां ज्वार-भाटा, पवनों और अन्य समुद्री कारक उस काल में भी विद्यमान थे। लोथल से प्राप्त ड्राई-डॉक 2400 ई पू का है और इसे विश्व की प्रथम ऐसी सुविधा माना जाता है जिस पर पोतों के आश्रय और उनकी मरम्मत की सुविधा थी। नंद और मौर्य काल में बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार गतिविधियां हुईं।

मौर्य वंश की समुद्री गतिविधियों के चलते भारतीय इंडोनेशिया और आस-पास के द्वीपों पर पहुंचे। इस काल में, भारत पर सिकंदर ने आक्रमण किया। यूनान और रोम के साहित्यिक अभिलेखों से नंद और मौर्य साम्राज्यों के दौरान समुद्री व्यापार होने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं।

मगध साम्राज्य में जल सेना का साक्ष्य: नौसेना द्वारा उद्धृत इतिहास के अनुसार विश्व की पहली जल सेना मगध साम्राज्य में थी। चंद्रगुप्त के मंत्री चाणक्य ने अर्थशास्त्र की रचना की थी उसके अंतर्गत एक नवध्यक्ष का उल्लेख मिलता है। इसमें अधीक्षक के अधीन जलमार्ग विभाग के कार्य का ब्यौरा मिलता है। अर्थशास्त्र में युद्ध कार्यालय के रूप में स्थापित एडमिरल्टी डिवीजन का भी उल्लेख है जिसे महासागरों, झीलों और समुद्रों में नौचालन की जि़म्मेदारी सौंपी गई थी। मौर्य शासन के दौरान रखी जाने वाले विभिन्न प्रकार की नौकाओं और उनके प्रयोजन की विस्तृत जानकारी भी इस पुस्तक में उपलब्ध है।

शिवाजी ने बनाई थी मजबूत नौ सेना: भारतीय तटों पर नियंत्रण करने अंग्रेज़ों के प्रयासों का मराठों ने डटकर सामना किया। मुगलों के लगातार आक्रमण का सामना कर रहे मराठों के पास आरंभ में कोई नौसेना नहीं थी। शिवाजी वे प्रथम योद्धा थे जिन्हें एक मजबूत नौसेना की आवश्यकता महसूस हुई। कोंकण तट पर पुर्तगालियों की नौसैन्य शक्ति को देखकर शिवाजी को कुशल पत्तन प्रणाली और मजबूत नौसेना के महत्व का पता चला। शिवाजी 40 साल तक इसके बलबूते पर अंग्रेजों और पुर्तगालियों को छकाते रहे।